Tuesday, December 27, 2011

हिसाब अब भी बाकी है.....


मेरे आँखों में सज़े ख्वाबों का
हिसाब अब भी बाकी है।
मेरे खवाबों में बीते लम्हों का
हिसाब अब भी बाकी है।
मेरे लम्हों में बसे उस अक्स का
हिसाब अब भी बाकी है।
उस अक्स से जुड़े अहसासों का
हिसाब अब भी बाकी है।
उन अहसासों से पनपे उस रिश्ते का
हिसाब अब भी बाकी है।
उस रिश्ते में दबे मेरे विश्वास का
हिसाब अब भी बाकी है।
मेरे विश्वास से बंधे उस नाम का
हिसाब अब भी बाकी है।
उस नाम से जुड़े उस शख़्स का
हिसाब अब भी बाकी है।
और उस शख़्स से उधार लिए कुछ ख्वाबों का
हिसाब अब भी बाकी है।

Friday, September 23, 2011

पूर्ण होने का भ्रम


आशाओं से दूर छिटक कर,
बैठा होगा कहीं मेरा अंतर्मन,
मैं जब भी ढूँढती हूँ कोने में
दुबका-सा मिल तो जाता है.

नहीं मिलता तो बस एक अहसास,
हर बंदिशों, जिम्मेदारियों से
स्वतंत्र होने का अहसास जो
मेरे मन को पूर्ण होने का भ्रम दे.

ताकि मैं उस अहसास के साथ
पीछे छूट जाने वाले एवं
आगे समय में अनायास ही
जकड़ लेने वाले भयपाश
से पूर्णत: मुक्त हो सकूँ.

और मैं जैसे शून्य में गिरती रहूँ,
अनंत समय के उस पार तक.
जीवंतता के अहसास से भी परे,
मैं जैसे किसी महाशून्य को
महसूस करूँ अपने पेट के भीतर.

और जब भी मैं पलकें खोलूं तो
मेरी बाहें स्वत: खुल जाएँ,
हर मोहपाश से पुन: जुड़कर
अपना जीवन धर्म निभाने के लिए.

क्षोभ


अकेले होने का क्षोभ
जब-जब हावी होने लगता है,
उँगलियाँ बिलबिलाने लगती है कि
यह दर्द उनके बस की बात नहीं.

चेहरों की दुनिया में मुखौटे
खूब बिकते हुए-से दीखते है,
मैं तब सोचने लगती हूँ कि
चेहरे की ही यहाँ कोई कीमत नहीं.

बीती चीजों में ढूँढती हूँ आज,
और आज में मैं कभी रही ही नहीं.
मेरे समय की पटरियाँ चलती तो हैं,
मगर कभी एक दूसरे से सहमत नहीं.

मैं रेत में छेद भी गिन लेती हूँ,
जो बस खालीपन के ही होते है,
और जो बालू मेरे हाथ में बचे है,
मुझे उसकी कोई भी सुध-बुध नहीं.

यह अजीब सा भय ही है जो
अपने वजूद को अपनी ही जिंदगी
के हाथों सौपने में होता है, जबकि
अपने वजूद का अभी तक कोई पता नहीं.

Monday, August 15, 2011

आज तुम स्वतंत्र हो...


स्वतंत्र हो आज तुम स्वतंत्र हो...
अपनी राह चुनने को,
उसमे भटकने को भी स्वतंत्र हो.....
तुम्हे कहने की आज़ादी है,
मौन रहने को भी स्वतंत्र हो.....
ऐसा देश है मेरा, ये सोचने
और न सोचने को भी स्वतंत्र हो....
दूर देश में परचम लहराने को,
पुरखों की आँगन बेचने को स्वतंत्र हो....
सच की गवाही परखने को,
झूठ की वकालत करने को स्वतंत्र हो....
तुम नई फसल खड़ी करने को,
पुरानी जड़ों को काटने को स्वतंत्र हो....
तुम स्वतंत्रता की परिभाषा को
उलटने को, भूलने को भी स्वतंत्र हो....
स्वतंत्र हो आज तुम स्वतंत्र हो...

Thursday, August 11, 2011

कशमकश.....

एक अजीब सी कशमकश है, एक जैसे चेहरों के बीच दूरियां दीखती है, और उन दूरियों में लिखी जाती है दूरियों की परिभाषा; मन चंचल होता तो है, मगर डोलना असहनीय-सा क्यूँ लगने लगता है उस धागे से बंधकर, जिसके अनगिनत मरोड़ों में कई कहानियां जमी, दबी-सी रहती है, और इन कहानियों के सुनने वाला कोई नहीं, वो भी नहीं जो इनके किरदार होते है; फिर एक हवा सरसराने लगती है, कान बंद करने का सवाल ही नहीं उठता, उसे जो कहना होता है, मेरे दिमाग में सोच बना के छोड़ जाती है; फिर सोचने की आदत बन जाती है अपने आप और एक दिन वो सोच को वहाँ रखना बंद कर देती है, जहाँ से मुझे चुनने की आदत लगी थी; आगे देखने को कुछ भी नहीं है, पीछे समय का पहाड़ इतना बड़ा हो चला है कि उससे होकर भी कुछ दीखता नहीं; आँख बंद करने से अंधकार भी दूर भाग जाती है, रोशनी आँखों में चुभती है तो रास्ता तो उजियारा हो जाता है, मगर कदम कहीं और गिरते है, पानी में डूबने के जैसा, और ज़मीन भी मुस्कुरा कर साथ छोड़ देती है; अंदर से एक पुकार आती है, 'मैं हूँ'...... तो मैं कौन हूँ? हाथ फिर किसी नए सोच से टकराते है, इस बार रखनेवाला पहले से ज्यादा अपरिचित-सा मालूम पड़ता है, नहीं सोचने की ताज़ी-ताज़ी आदत फिर टूटने लगती है, कशमकश का दायरा फैलने लगता है, दूरियां पहले से लंबी लगने लगती है, मन अब पहली बार खुद से सवाल पूछता है कि कौन नजदीक लग रहा अब तुम्हे? और कौन जाना हुआ-सा? मुझे मालूम है ये बेताल का प्रश्न है, जवाब देकर भी उसी कशमकश में डूबना है, जिसमे तैरने की मनाही है. अजीब सी कशमकश है......

Saturday, July 16, 2011

दिल मेरा भर आया था.....

फिर वही सैलाब
जलने आया था शायद,
देर रात फिर एक
सिगरेट सुलगाया था.

बंद दरवाजे में
तुमको मैंने फिर
घुटन की हद तक
गले से लगाया था.

यादों का धुआँ भी
पंखे से लग-लग कर,
बार-बार मुझ तक ही
लौट के आया था.

आँखों में सुबह
हो गई फिर से,
फिर से सूरज
जल के आया था.

मेरी ही चिंगारी
लगी थी सूरज को,
बादल उसके भी
तन पे छाया था.

खिड़की के कांच पर
हाथ रखे थे कई दिन बाद,
और कई दिन बाद भी
ख़ामोश-सा हर साया था.

इक मैना रोज आती है
मुझे टुकुर-टुकुर देखने,
उसे मेरी टकटकी ने ही
आज फिर से भगाया था.

खिडकी खोल के उन
गिरफ़्त धुआँ यादों को,
शायद फिर से मैंने
बाहर का रास्ता दिखाया था.

दूर पक्की जमीन पर बूँदाबाँदी
भी इत्तला कर गई है,
कि सूरज ही रोया था
या दिल मेरा भर आया था.

Monday, July 11, 2011

सोचा है कभी?

कूड़े के ढेर में
सपने चुननेवाले
वो नंगे पांव
बिन मांगे
रोगी बन जाते है;
और रोग बांटनेवाले
अब भी बाज़ारों में
प्लास्टिक की थैलियाँ
मांगते है.

सोचा है कभी?

दाने-दाने को
तरसती है
अब भी
कितनी ही अंतड़ियाँ;
और दाने-दाने में
नाम भी नहीं
ढूँढ़ पाती है,
कई घरों की थालियाँ

सोचा है कभी?

दूर सुदूर गाँव के
के चरवाहे बच्चे
नेत्र-जल जला के
क ख ग लिखते है;
क्यूँकि सरकार निकम्मी है
और हम पंखें-बत्ती
बंद करना नहीं जानते है.

सोचा है कभी?

अखबार में
एक पूरा गांव
आर्सेनिकयुक्त जल से
लकवाग्रस्त बताया गया है;
और आईने में देखते हुए
टूथब्रश चलते है,
नल तो बैकग्राउंड म्यूजिक
के लिए चलाया गया है.

सोचा है कभी?

एक हताश किसान
खेत में खड़ी
लहलहाती फसल को
कैसे उजाड़ता होगा;
कैसे तब जा के
किसी धनीजन का
मनचाहा व आलीशान
स्वप्नमहल बनता होगा.

सोचा है कभी?

ग्लोबल वार्मिंग
का दोष एक तरफ
जंगल का कटना
माना जा रहा है;
और इसी बात पर
जागरूकता का हुंकार
उसी जंगल से बने
कागज पर लिख कर
भरा जा रहा है.

सोचा है कभी?

एक गुल्लक पैसा
जब कुछ सांस
खरीदने में अक्षम-से
प्रतीत होते है;
तब ही शायद
सैमसंग टचस्क्रीन
के बाजारू भाव
गिरे हुए-से लगते है.

सोचा है कभी?

देश को प्रगति
के चक्के में
सवार करने की
कोशिश करते रहते है;
और स्व-पतन की
राह पर अक्सर
हम चक्षु-सहित भी
अंधे करार किये गए
बने फिरते रहते है.

सोच के देखना.....

Tuesday, June 28, 2011

लव आज कल भाग -५

इस कहानी के पिछले भाग : शुरूआतीभाग-१, भाग-२, भाग-३, भाग-४

ज़िन्दगी क्या है? क्या यही जिसे मैं जी रही हूँ? एक मुस्कान को अपने चेहरे में चिपका कर एक मरे हुए शख्स की मरने की खबर छुपाने के जैसा? ये वही मुस्कान है न, जिससे हाथ मिलाने के बाद से ही मुझे अवसाद भरा कोढ़ होना शुरू हुआ था. हाथ की उंगलियाँ गलते-गलते शायद अपने साथ स्पर्श की परिभाषा भी लेते चली गयी है. अब जब भी अपनी उँगलियों को छूती हूँ तो लगता है कि किसी अँधेरे कोठरी के भीतर रखे बरसों पुराने लोहे के जंग लगे बक्से को छू रही हूँ जैसे. जब कभी बक्से की कुण्डी से हाथ टकराते है तो फिर वही मुस्कान आ जाती है, तब जाके कुछ अंदाजा लगता है कि यह तो मेरा ही मन हैं.  अब तो मन भी मन को पहचानने से इनकार करने लगा है या मन के अंदर चलनेवाले सोच की ताकत मन की ही नींव को तोड़ रही है. शायद इसे ही खुद से खुद को तबाह करना कहते है. सोच का क्या है? ऐसे ही चलते रहेगी, जैसे समय अपनी गति से गतियमान है. और यहाँ मेरे मन की तलहटी में भी एक खाई खुदी जा चुकी है निर्बाध गति से. ब्लैक होल क्या होता है? यह किताबों से बेहतर यहाँ समझ में आता है, जब मन में झाँकने की कोशिश करती हूँ तो लगता है कि ब्लैक होल इसी का कुछ अंश रहा होगा. एक अहसास को भी मैं इस खाई में फेंकना चाहती हूँ, जो तुम दे गए हो. मेरे हाथो की उँगलियाँ भी खतम हो रही है धीरे-धीरे, अब इनमें इन्हें सहेजने की ताकत नहीं रही. सोचती हूँ कि स्वयं ही इन हाथों से तुम्हें मुक्त कर दूँ तो उतना खराब नहीं लगेगा जितना कि पकड़ कर संजो के रखने की जद्दोजहत में, कहीं फिसल कर छूट जाने की दुर्घटना में. प्रेम में मलाल नहीं होना चाहिए, मगर तुम्हारे चले जाने का कारण नहीं ढूँढ पाना, मलाल को स्वत: निमंत्रण दे देता है मेरे मन के आँगन पर. ये मलाल रोज़ मेरे मन के आँगन पर तुम्हारी गैरमौजूदगी को मनाता हो जैसे, हर रात आँगन की मिटटी लाल होती रहती है. शायद फिर कोई ज़ख़्म फूट आया हो, शायद फिर कोई दिन याद आ गया हो. बीता वक्त बादल बन कर ही आता है और जब भी बारिश होती है तो मन की मिट्टी से तुम्हारी खुशबू आने लगती है, सोंधी-सोंधी सी, जैसे तुमसे भींग कर आई हो.

उस दिन भी तो बारिश हो रही थी, सुबह से शाम तक कितना इंतज़ार किया था कि शाम को तो साथ रहेंगे. मगर फिर तो तब हद ही हो गई थी, जब हमने लव आज कल की ४ टिकटें ले ली थी, जिसमें एक श्यामली, दूसरा गिन्नी का, तीसरे व चौथे में मेरा तुम्हारा नाम लिखा गया था, हैं न? और तुम तब भी नदारद ही थे. फिल्म के शुरूआती सीन को देखते वक्त मन में बस यही हलचल मची हुई थी कि ये सीन तुम्हारे साथ देखना न नसीब हुआ. खैर तुम २० मिनट के बाद आ गए थे और तुम्हें लेने भी मैं ही गई थी. कायदे से तो श्यामली को तुम्हें लेने जाना था, मगर पता नहीं कैसे उसने मुझे तुम्हारा टिकट पकड़ा दिया और कहा कि उसे ले आओगी? मैंने भी सहर्ष स्वीकार कर लिया था, अब सोचती हूँ तो लगता है कि कहीं श्यामली इस बात को गौर तो नहीं कर ली थी न?
मैं आज भी सोचती हूँ की उस वक्त मेरे मन में क्या था? जिसे जानने के लिए मैं वहाँ हॉल के बाहर तुम्हारा इंतज़ार करने लगी थी. तुम्हे सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते हुए देखना और फिर मन के चोर को तुम पकड़ न लो इसलिए उतना ठीक से भी नहीं देखना कितना कष्टप्रद रहा होगा न मेरे लिए उस पल!
तुम जब सीढ़ियों से चढ़ते वक्त मुझे ऊपर से नीचे देख रहे थे, उससे तो मुझे गुस्सा आना चहिये था न, फिर वो कौन-सा जादू था, जिसके बिखरने पर तारों के छिटकने का अहसास हो रहा था और उन तारों में सबसे दमकता हुआ चेहरा तुम्हारा क्यूँ दिख रहा था? मुझे इतना समझने का मौका भी तो नहीं दिए थे तुम. आते ही मुझे जोर से एक चिकोटी काटी थी मेरे कमर पर और मैं तुम्हें डांटने के बजाय घबरा कर इधर-उधर देखने लगी थी कि और किसी ने तो नहीं देखा न? तुम फिर कानों में ‘मोटी कहीं –की’ घोलने लगे थे.
“कितना खाती है? देख, मेरे हाथ में तेरी चर्बी आ जाती है” – मुझे उस समय भी कुछ कहते न बना था. तुम ऐसा ही करते थे, हर काम डाँट वाला ही करते थे, मगर फिर भी बच जाते थे.
“अच्छा! सीटिंग अरेंजमेंट क्या है?”
“श्यामली, गिन्नी मैं और तुम! वैसे तुम अपनी और मेरी सीट बदल भी सकते हो. जैसे तुम्हे ठीक लगे.”- मैं तुम्हें यह सब क्यूँ बता रही थी? तुम सच में हर बात मनवा लेते थे.
“गुड! तब मैं गिन्नी के बगल में बैठूँगा. एक बात बताओ कैसी है वो?” – और तुम मेरा चेहरा देखने लगे थे या पढ़ने लगे थे.
‘अब मिल के ही जान लेना’- और मैं तुम्हें तुम्हारें आधे भींगे बालों को सहलाने की इच्छा करने लगी, सिर्फ मन-ही-मन में. लेकिन मुझे ये नहीं पता था कि तुम सच में गिन्नी के बगल बैठ जाओगे. सच बताऊँ तो मुझे मन कर रहा था कि तुम्हें सीट से उठा कर सैफ के पास फेंक दूँ.
फिर तब मन ने कहा की क्यूँ ऐसा तू करेगी? तू कौन है और ये कौन है तेरा. गिन के ही मुलाकातें हुई , उसपे इतना हक कैसे कोई तुमपे जमाएं.
कुछ देर तक तो मैं मूवी ही देखने लगी, इस बात को दरकिनार करके कि तुम गिन्नी से ज्यादा बात कर रहे थे और मुझसे बिलकुल भी नहीं. तो फिर क्यूँ कहा था कि तुम्हें भी मेरे साथ ही वो मूवी देखने का मन था. इधर से बगलवाला भी इतना परेशां कर रहा था कि मेरा गुस्सा बढ़ता जा रहा था. इसे मेरी इतनी भी फिकर नहीं कि मुझे उस बगलवाले के अत्याचार से बचाएँ. पर नहीं, जनाब का तो ध्यान ही कहीं और था. अच्छा हुआ जो इंटरवल हो गया. उसके बाद मेरे दिखाने की बारी थी ना. मैं भी हमेशा अच्छे वक्त का ही इंतज़ार किया करती थी.  इंटरवल के बाद मैं जब श्यामली के सीट में बैठ गयी, तब तुम्हारा चेहरा देखने लायक था. तुमको लगा कि ये क्या हो गया? तुम्हारा तमतमाया चेहरा सब बयां कर रहा था. और मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था कि रहो अब! गिन्नी के पास और साथ में श्यामली के साथ भी - एक के साथ एक फ्री!
मैं १५ मिनट में वापस जा रहा हूँ’- तुम्हारा एस एम एस पढ़कर मेरी तो जान ही निकल गयी कि ये मैंने क्या कर दिया.
नहीं मोमो, प्लीज़ मत जाओ. सॉरी L
मैं कुछ नहीं जानता, तुम मेंरे बगल में क्यूँ नहीं हो. मैं मूवी तुम्हारे साथ देखने आया था. मैं जा रहा हूँ.”
तुम्हें गिन्नी के पास बैठना था न, तो बैठो न आराम से. यह मेरा जवाब था उस समय, जिसमें मेरी सारी चिढ़न समाहित थी. फिर तिरछी नज़रों से तुम्हें देखा भी था, तुम भी मुझे देख रहे थे, शायद मुझसे भी ज्यादा गुस्सा आया हो तुम्हें.
एक पल का ही अंतराल रहा होगा तुमसे नज़रें मिलाने के बाद जब मुझे लगा कि मेरा यह करना मेरे लिए ही दुश्वार-सा लगने लगा था. तब समझ में आने लगा था कि मुझे तुम्हारे बगल में ही बैठना ज्यादा अच्छा लगता, भले ही तुम्हारा ध्यान कहीं और क्यों न हो? उसके बाद की घड़ियाँ मूवी के खतम होने तक मैंने कैसे बिताई या तो मैं समझ सकती थी या नहीं तो तुम.
वैसे मूवी अच्छी थी ना... पता नहीं क्यूँ शुरू से अंत तक मैं मूवी में तुम्हें और अपने को ही देख पर रही थी. तुम भी शायद!... शायद इसलिए कि तुम कभी बताते नहीं हो और मुझे खुद ही जानना पड़ता है.
मैं यक़ीनन तुम्हें उतना तो नहीं ही जान पाई थी कि कोई भी लड़की तुम्हारे प्यार में पागल हो जाये. मगर मैं थी, यह मुझे तब पक्का लगने लगा था.
मूवी के बाद गिन्नी और श्यामली के खातिर हम शॉपर स्टॉप में भी गए, जहाँ न तुम्हें कुछ देखना था और न मुझे कुछ लेना था. बस मैं चाह रही थी कि कब श्यामली सलवार सूट देखने में व्यस्त हो जाये और मुझे तुमसे बात करने का मौका मिले. मगर श्यामली को भी तुमसे ही पसंद करवाना था. वो तो मैंने ही उसे कहा कि “उस सेक्शन में कुछ अच्छे कलेक्शन है, उसे देख आओ”. पता नहीं, तुम मेरी इस चालाकी को कहीं भांप तो नहीं गए थे न. जानो तो जानो, मेरी बला से! मुझे तुमसे उस समय बात करना था, तो करना था.
“गुस्सा हो?”
“किस बात के लिए?”—तुम्हारा यही उत्तर होगा जो मुझे पहले से ही पता था.
“सॉरी बाबा! आज के बाद से ऐसा फिर कभी नहीं करेगे.”
“आई विल किल यु, इफ यू एवर डू इट अगेन.”
“सॉरी बोला न! अबसे नहीं करेगे.”—और फिर हम पता नहीं किन बातों में खो गए कि याद ही नहीं रहा हम थोड़ी देर पहले गुस्सा थे एक दूसरे से.
एक बात तो अब भी मानती हूँ कि तुम्हारा गुस्सा वाला चेहरा देख के मुझे लगता है कि तुम कभी भी माननेवाले नहीं, मगर फिर भी दो मिनट में मान जाते थे.
लेकिन मुझे फिर तब भी गुस्सा आया था जब तुम गिन्नी के साथ “हैंग ओवर “ में काउंटर गए थे. क्या तुम्हें ये पूछना जरूरी था कि “कौन जायेगा मेरे साथ?” सीधे – सीधे मुझे नहीं कह सकते थे कि चलो मेरे साथ. और तो और बगल टेबल वाला को भी तभी ही मस्ती सूझ रही थी. जितने देर तुम काउंटर में थे , उतने देर से उस सड़े –से मोटू को झेलना पड़ा था.
उसके बाद भी प्लेट शेयर किया था तुमने गिन्नी के साथ. लेकिन इस बार मैं और गुस्सा नहीं कर सकती थी. अभी पिछले का ही असर काफी खतरनाक था.
फिर तुम्हें अपने कैंट भी तो जाना था. और तुम जल्दी-जल्दी में चले गए. मुझे अब भी याद है कि श्यामली जल्दी में थी और मुझे और गिन्नी को भी जल्दी चलने को कह आगे बढ़ गयी थी. तब तक तुम स्टैंड में ही थे और अपनी बाईक निकाल रहे थे. मुझे मन था कि तुम्हें दूर तक जाता हुआ देख लूँ, फिर चलूँ. मगर श्यामली और गिन्नी के पीछे-पीछे हो ली. बहुत दूर जाने के बाद मन किया कि पीछे मुड़ कर देखूं कि तुम कहाँ तक चले गए होगे? इसके लिए भी मैं धीरे-से अपनी दोनों सहेलियों से थोड़ा पीछे होकर मुड़कर देखी थी. तुम बाईक में बैठे जैसे मेरे मुड़ने का इंतज़ार कर रहे थे. मेरा वो धीरे-से हाथ हिला के उस रात के लिए विदा कहना और फिर तुम्हारा हेलमेट लगा के मुड़ जाना, कितना रूमानी –सा लगता है, अब भी. ये मीठी यादें अब भी इतनी मीठी है कि इनमें जब तब मेरे मन के चींटे लग जाते है. तुम क्या अब भी इस तरह मेरा इंतज़ार करते हो, मेरे पीछे मुड़ने का. नहीं न... मैं तो अक्सर सूनी राहों में अब भी ठिठक-सी जाती हूँ, कहीं तुम रुके तो नहीं रह गए न, और मन मुड़ कर दूर – दूर तक तुम्हें तलाशने लगता है.

रुक गए है कदम वहीँ, मैं बस आगे की तरफ चलती रही....
लौट गया तेरा चेहरा भी, बस नज़र ही मेरी तुझपे जमी रही....

Saturday, June 4, 2011

अतिरिक्त किराया

इक ख्याल आता है,
फिर इक ख्याल लौट जाता है.
जो रह जाते है मन में,
तेरा ही नाम हर जगह बस लिख जाता है.

एक करवट बदलती हूँ,
जैसे पन्ना कोई पलटती हूँ
जाने कितने पन्ने बाकी है अब भी?
तेरे नाम वाली किताब कौन सिरहाने रख जाता है.

तेरा नाम जैसे सुनती हूँ,
सिलवटों को जब भी मैं छूती हूँ.
तुझसे ही बना हो जैसे हर धागा,
हाथों की लकीरों में तेरी छुअन कोई फूंक जाता है.

इक मद्धिम-सी रोशनी में
आँखें किसी को टटोलती है.
‘कोई नहीं है’ ये जान कर जब फिर सोती है,
कोई हवा में घुल कर मेरी पलकों में छुप जाता है.

कोई सपना नहीं आता है,
अब नींद कोसों दूर रहती है.
मेरे आँखों में ये महफ़िल है किसकी,
जाने कौन तेरे नाम में मेरा नाम अब भी गुनगुनाता है.

हर सुबह की दहलीज पर
आसमां से नीला खत इक आता है.
संग मेरे अब भी जो तुम रहते हो, इस बात पर
मुझे रात भर जगाकर जैसे अतिरिक्त किराया वसूल कर जाता है.

Monday, April 25, 2011

हिसाब-किताब

वक्त का पहिया बड़ा अजीब-सा होता होगा- समय तो आगे बढ़ता ही प्रतीत-सा होता है, मगर मन न जाने उसी पल के खूंटे से बंधा हुआ है अब तक, जैसे धुरी हो पहिये की. जैसे धुरी के बल पर ही पहिया आगे बढ़ सकता है, तो क्या वैसे ही तुम मेरी धुरी बन गए हो क्या? मुझे आगे तक साथ देने के लिए, वहाँ भी जहाँ तुम्हारी-मेरी ज़मीन का बंटवारा बिना किसी झंझट व वाद–विवाद से हो गया है. बंटवारा का फासला इतना बड़ा होगा, ये तब जाना जब तुम्हें देखने की शिद्दत हुई तो पाया कि तुम नज़रों की सीमाओं से ओझल हो चुके हो. सच में! तुमने तो ज़मीन ही बदल ली, इतनी दूर कि अब हमारी सीमाओं का मिलन संभव ही नहीं. अच्छा! फिर ये बताओ कि मुझे तुम्हारी महक क्यूँ महसूस होती रहती है? इन हवाओं का सीमा –निर्धारण करके भी जाते तो अच्छा रहता. और हाँ! यादों का बंटवारा तो तुमने बिना करे ही चले गए. और वो कुछ लम्हों में से मैं अपने को तुमसे कैसे अलग कर लूँ कि तसल्ली हो जाये कि हिसाब बराबर हो गया है. वक्त की कैंची में भी उतना धार अब नहीं रहा, तुम्हारे नाम पर कैंची भी चलने को इनकार कर देती है. हाँ, अगर चलती है तो उन तारीखों पर ही, जो यह जताना चाहती है कि तुमको बीते हुए अब अरसा हो गए है. इसलिए तो आज भी तुम मुझे ‘कल के बाद का आज’ लगते हो. आज एक और हिसाब बताना चाहती हूँ, जिसका तुम्हें अंदाजा भी नहीं होगा- तुम्हारे जाने के बाद का हिसाब. तुम्हारे जाने के बाद बीते पलों में भी मैं तुम्हारे साथ ही थी, अपनी दुनिया में. उन पलों का ब्यौरा कभी देते नहीं बना, शायद हक की अभिलाषा तुम अपने साथ ले गए थे. अब ये तो बताओ क्या इनका भी हिसाब करना होगा? जहाँ तक मैं समझती हूँ इनका हिसाब करने बैठूं तो मैं ताउम्र तुम्हारी कर्जदार ही रहूंगी. हर बार तुम्हें मैं लौटाने आऊँगी, और हर बार तुम मेरे साथ वापस भी आ जाओगे. तुम भी देखना कहीं मैं भी बची तो नहीं रह गयी तुम्हारे पास. अगर मैं मिलूं तो भेज देना, मेरे सूखे-से आँख पानी को तरसते हैं शायद, खुद को पूरा पा लूँ तो इस अधूरेपन के अहसास से मुक्ति मिले. चलो, हम ये हिसाब-किताब जितनी जल्दी कर ले, उतना ही ज्यादा अच्छा रहेगा हम दोनों के लिए-फिर तुम तुम बन जाना और मैं मैं. बस इसके बाद ‘हम’ मर जायेगा.

Sunday, April 24, 2011

५ सेकेण्ड की तुम्हारी आवाज़


तुम्हारी आवाज़ आज भी सुनती हूँ तो लगता है जैसे मुझे मेरी कस्तूरी का ठिकाना मिल गया है, इसलिए तो उस विडियो में सिर्फ ५ सेकेण्ड का वो अंतराल मेरे लिए पूरी जिंदगी जैसी लगती है. उसमें तुम्हारी आवाज़ जो सुन पाती हूँ मैं! भले ही वो बातें मेरे लिए नहीं थी. मगर तुम्हारी वो खिलखिलाहट जिसे सुन के मन को बस लगता है कि और क्या चाहिए? जब तुम सामने प्रतीत-से होते हो तो एक पल के लिए मैं सब भूल जाती हूँ कि क्या-क्या हो गया इतने दिनों के लंबी चुप्पी में.

लोगों को तो कह देती हूँ बड़ी आसानी से कि बंद दरवाजे को देखना बंद करके खुली राहों को अपना लेना चाहिए. मगर यही समझदारी अपने पर आती है तो मैं बेवकूफ ही बनना पसंद करती हूँ. और क्यूँ नहीं देखूं उस बंद दरवाजे को जिसके उस पार तुम अब भी होगे, अपनी दुनिया के साथ. बस वो दरवाजा मुझे ये कड़वा अहसास दिलाते रहता है कि उस पार की दुनिया में मैं तुम्हारी कुछ भी नहीं. शायद वो दरवाजा नीम की लकडियों से बना होगा, कड़वा कहीं का. बस अगर तुम उस दरवाजे को छू देते तो उतना कड़वा भी नहीं लगता. मगर तुम शायद इस दरवाजे को भूल गए हो.

कभी सोचती हूँ कि क्यूँ दिखा तुम्हें यही दरवाजा और चले आये बिना पूछे. तुम जैसे कोई क्रिकेट की गेंद वापस लेने आये थे और चले गए. वो कांच जो टूट के ज़मीन पर गिरा था तुम्हारे जाने के बाद, वो गेंद से तो नहीं ही टूटा था. कुछ समय के टुकड़े अब भी उस जगह अपनी दाग बनाये रखे है, वो अब पुरानी निशानी-से लगने लगे है. गेंद से शायद मेरे घर की रौशनी रूठ गई थी, तभी तो तुम्हारे जाने का पता भी नहीं चला. एक लौ अब भी कोने में जलती रहती है, तुम्हारे जाने के बाद जलाया था मैंने कि अबकी बार आओ तो अपनी गेंद वापस ले जाना, मैंने उसे दरवाजे की कड़ी में ही टाँग दिया है. समय काफी बीत चला है, बरसात, गर्मी ठण्डी सब मौसम आके चले गए है. इसलिए हो सकता है कि तुम अपनी गेंद को पहचान न पाओ. एक पर्ची में तुम्हारा नाम लिखा है बिना अपने नाम के. उसे देख लेना तो समझ जाओगे कि गेंद अब भी तुम्हारी है, तुम अब भी उससे खेल सकते हो. मगर मैं दुबारा गेंद को वापस लौटा नहीं सकती, मेरे हाथों में कुछ कांच के टुकड़े अब भी चुभे रह गए है, हो सकता है समय की खरोचें तुम्हें भी लग जाये.

अब तुम कैसे आये और क्यूँ गए? यह सोचने में क्या रखा है? जो है उसे सोचती हूँ बस. दीवारों में परछाई अब भी दीखती है, तुम्हारे आने की, उसे निहारा करती हूँ. यादों के पलंग पर आज फिर से तुम्हारी आवाज़ सुन रही हूँ, नींद नहीं आने का गम फिर कम-सा लगने लगता है. ५ सेकेण्ड की तुम्हारी आवाज़ मुझे सच में कितनी बार उस दरवाजे से अंदर-बाहर करवाने लगती है.

Thursday, March 31, 2011

क्या लिखूं?


क्या लिखूं? कि लिख देने के बाद यह लगे कि सब कुछ लिख दिया अब तो. बाकी तो फिर भी रह जाती है जिंदगी अनस्याही – सी. जो स्याही में डूब गए, मानो गंगा तर गए. पिछले चार सालों से वही एक रास्ता अपनाती हूँ, मेरे साइकिल के चक्कों को तो एक - एक कंकड़ों से मोहब्बत भी हो गई होगी. वो जान जाते है कि कब धीमे हो जाना है, कब गढ्ढे आयेंगे और कब कोई कील उन्हें चुभो सकती हैं, कौन-से वृक्ष के छाया में वो खड़े रहने के हक़दार है. यहाँ तक कि उन्हें अब तो शायद वापसी का भी अच्छी तरह से आभास होने लगा है. आज जब साइकिल के ताले को ठीक से लगाने की कोशिश की तो पाया इन्हें भी आदत हो चुकी है, टेढ़े लगे रहने की, और मुझे सोचने की. २ मिनट के रास्ते में सैंकडों लोग दीखते है, मगर सब वही, वैसे ही, बस कुछ रंगों के व जगहों के भेदभाव के साथ. वो एस.एन.(सरोजिनी नायडू) के गेट के पास खड़े और बतियाते लोग कभी कम नहीं होते. आज वो जो लड़की नीले रंग के छाते के साथ किसी से फोन पे बात कर रही थी, उसे भी रोज ही देखती हूँ और रोज ही यही सोचती हूँ कि इसे भी तो इंजीनियरिंग ड्राईंग पढ़ाया था. मुख्य चौराहे पर आकर वो २-४ सिक्यूरिटी गार्ड्स के चेहरें याद आने लगते हैं कि उनमें से कोई एक फिर वहाँ खड़ा होगा तो घूम कर जाना होगा L. अगर कोई भी गार्ड नहीं दीखता तो सबसे पहले घड़ी पे नज़र जाती, अच्छा! अभी तो क्लास का समय हैं, अच्छा हुआ कि इस समय पर आये, अब मैं शॉर्ट कट से जा सकती हूँ J. डिपार्टमेंट में आने से पहले मुझे उस माली की भी याद आती है, उसे कभी काम करते वक्त देखा तो नहीं है, क्यूंकि मैं अक्सर उसके विश्राम के समय पर पहुँचती हूँ. मगर वो प्यार से एक बराबर किया हुआ मिटटी का रंग और वो धागे से भी ज्यादा सीधा मिटटी का हर कोना, साथ में कतार में खड़े जैसे उस माली की हर आज्ञा का पालन करते हुए नन्हे-नन्हे से गेंदे के पौधे, जिसमे कलियाँ आई भी नहीं है मगर उस माली की नज़रों से देखने पर पता चल जाता है कि किसमें कौन – से रंग का फूल आनेवाला है, सब उस माली का ही परिचय देते है. बहुत दिनों से अपने बाबा को देखी नहीं हूँ. बाबा यही नाम तो दिया था जब पहली बार उस बरगद के पेड़ को देखा था. पता नहीं अब कैसा होगा? मुझे याद भी करता होगा कि नहीं? मैं भी इतने दिनों से उसे सोची नहीं. भूलती तो नहीं हूँ, बस याद करना भूल जाती हूँ. मुझे दौड़ना बिलकुल पसंद नहीं, और तब तो बिलकुल भी नहीं जब एक – एक शिराओं में दर्द चिल्लाने लगे कि अब तो हमें बाहर निकालो. मगर ऊपर वाले खाने, जिसे दिमाग कहते है लोग, में से एक जोर की आवाज़ आती है कि कितना है तुममें दम? जैसे मुझपे हारने का व्यंग्य रच रही हो. यह आवाज़ इतनी झन्नाटेदार होती है कि मैं बहुदल में सम्मिलित सभी दर्द को नकारते हुए अपने आपको हारने से बचाने लगती हूँ. मगर कब तक? उस मिटटी के टीले तक आते-आते तो मैं रुक जाती हूँ, तब भूल जाती हूँ कि मुझे हारने से क्षोभ होता है. तब शायद जीत - हार के कशमकश से ऊपर उठ जाती हूंगी, तब मेरा रुख उस टीले की ओर हो जाता है. उस पर पैर रखकर मैं दर्द को बाहर निकालने की कोशिश करती हूँ, थोड़ी देर पहले ही जिनकी आवाजों को मैंने अनसुना किया था. रात को जब बिस्तर से अचानक उठती हूँ तो पता चलता है कि अनसुने कर दिए जाने के कारण नाराज़ हुए कुछ दर्द के कतरे अब भी पैरों में बिलबिला रहे होते है. तब उन्हें सहला कर ही मैं मना सकती थी. सुबह होते हुए तो कभी ही देखती हूँ, खिड़की पर पर्दा बराबर लगे रहता है, मैंने अपने साथ कमरे के बाकी रह्नुमों को भी बाहर झाँकने के लिए मनाही कर रखी है. सूरज अब पिछले जनम का दोस्त - सा लगता है, जो रोज दरवाजा खटखटाता तो है, इस आस में कि शायद आज कमरे में पड़े किसी एक को उसकी याद आ जायेगी तो दोस्ताना पूरा हो ! मगर जो रात के बजाय सुबह में क्लोरोफॉर्म सूंघने के आदी हो गए हो, उसे सूरज की शक्ल किसी प्लास्टिक के थैले में भरे पानी जैसी लगती होगी, पकड़ना चाहो तो पता नहीं किसकी शकल बना ले. इसलिए भी यह दोस्ताना अधूरा रह जाता होगा बार - बार. और जब वो पानी वाला प्लास्टिक का थैला ऊपर चढ़ जाता है तो, पहचान भी लूँ तो क्या फायदा? तब उसके या मेरे होठों की मुस्कराहट, जो बिछड़े साथियों के पहचान लिए जाने पर आती है, दोनों में से किसी को भी नहीं दीखती होगी. नहीं मिल पाने गम भी हम कितने अच्छे से छिपा लेते है, वो इतनी रौशनी भर देता है कि आँखें खुलती भी नहीं और मैं सिर पर टोपी लगा के नज़रें चुरा के निकल जाती हूँ. बहाने हज़ार मिल जाते है, दलीलों को सच बनाने के लिए, जैसे मैं लिखती हूँ यह कह कर कि लिख लूँ तो जी लेती हूँ. जीने के लिए लिखना आवश्यक है क्या? ‘नहीं’ उत्तर का उत्तर तो नहीं मिला मुझे आज तक, इसलिए लिखती चली आई हूँ. यदि आवश्यक है भी तो फिर सोचने लगती हूँ कि क्या लिखूं? कि जी सकूँ.

Sunday, March 20, 2011

तुम.....


जैसे कुछ पन्ने उड़ कर
कभी वापस आते नहीं,
तुम भी किस्तों में
उड़ जाते तो अच्छा रहता.

तुम इतने गहरे व तीखे
हो चले हो कि
मन की गिरहें भी काट लूँ, तो भी
तुम्हारा जाना अब संभव नहीं लगता.

गीली मिटटी –सा मेरा मन
ढले भी तो सिर्फ तेरे सांचे में;
मैं सूख कर भी ढूँढूं तुम्हें,
बनते दरारों के रेखाजाल में.

कोई पीपल - सा बीज
मन में बो गए हो तुम;
यादें आकर सींचती रही,
धीरे-धीरे तुम बढ़ने लगे हो मुझमें.

मैं तंग आ गई हूँ अब तुमसे
तुम चले जाओ दूर मुझसे;
इक घुटन – सी निकलती आह
कि क्यूँ तुम आए मेरे पास?

मत आओ मुझे बहलाने,
जब होऊं तुम्हें लेकर मैं उदास;
तुम जैसे पलट के फिर मुस्काते,
मानो मेरे हर सवालों का तुम जवाब.

Wednesday, January 19, 2011

एक शिकायती पन्ना-भर मेरी जिंदगी.....

कभी-कभी मैं अपने आप से ही उकता जाती हूँ. क्या करना है? यही नहीं पता है और जो कर रही हूँ तो क्यूँ कर रही हूँ? वो भी नहीं पता. जो नहीं करती, तो क्यूँ नहीं करती? वो भी नहीं पता. कभी लिखने का बहुत मन हो जाता है तो लिख के सुकून-सा लगता है, कुछ बोझ कम हो गया हो जैसे. तो कभी क्यूँ लिख कर बोझ को कम करूँ? यह सोच-सोच कर परेशान हो जाती हूँ. ये लिखने का तरीका भी अपनाते-अपनाते अब बोरियत-सी लगती है. कभी दौड़ने चले जाती हूँ, तो लगता है कि लोगो को देख कर खुशी मिल सकती है. कभी जब वापस कमरे में बैठती हूँ, तो लगने लगता है कि ये खुशी कभी टिकनेवाली नहीं है. तो क्यूँ मैं इसके पीछे-पीछे भागती रहती हूँ? हाँ, एक चीज़ सदैव साथ रहती है मेरी तन्हाई. मगर साथ देती है, तो पीछा छुड़ाने का मन करता है. शायद मैं अजीब ही हूँ. दुनिया में जोड़-घटाव तो लोग जन्मने के बाद से ही सीखने लगते है, मुझे क्या पड़ी थी कि ये सोचने की कि जोड़ क्यूँ और घटाव क्यूँ? ‘कुछ भी नहीं’ क्यूँ नहीं और ‘कुछ नहीं’ तो क्यूँ ‘कुछ नहीं’? सवाल-पे-सवाल और उसके बीच मैं. जो नहीं मिल पाता उससे दूर तो हो जाऊँगी धीरे-धीरे. मगर फिर किस पे जाके टिकूँ कि मुझे राहत मिले? कभी तो कोई क्षण हो, जो मेरे अनुसार बनी हो, जन्मी हो. मगर नहीं यहाँ पर इतनी चिल्लम-चिल्ली में मेरी बात कौन सुनेगा? और वो उपरवाला, उसे क्या कहूँ? कभी लगता है, मेरे साथ ऐसा हो रहा है तो क्या उसकी वजह वो तो नहीं? जब मैंने उसकी मूरत वाले सारे मूर्तियों को तोड़ कर अपना गुस्सा ठंडा किया था. शायद इसलिए वह मुझसे गुस्सा भी गया है, इसलिए मेरे रास्ते और टेढ़े-से-टेढा करते जा रहा है. मगर उसका क्या जो उस पण्डे ने पैसे लेकर तेरे नाम की पुड़िया दी थी. एक लाल चुनरी अब भी मेरे कमरे में रहती है, यह जताने के लिए कि मैंने तुम पे कितना विश्वास किया था. सरे झोलाछाप पूजा पर आखिर विश्वास ही तो किया था न. पूजा गलत हो सकती है, दिखावा हो सकता है, मगर क्या मेरा विश्वास गलत था? तुम्हारी चुनरी अब भी चमकती है, वैसे ही जैसी पहले थी. शायद तुम्हारे आस पास कुछ भी नहीं बदला हो, तो मेरी दुनिया क्यूँ बदली? अगर तुम मुझसे जुड़े हुए हो या मैं तुमसे, तो तुम्हे मेरे जीवन के बदलाव से फर्क महसूस क्यूँ नहीं होता? जैसे मुझे लगता है कि तुम बादलों के ऊपर अपने सिहांसन में बैठे मुझे देख रहे होगे तो तुम्हें क्यूँ नहीं दीखता कि मैं रो रही हूँ? मैं रो रही हूँ कि किस-किस पर विश्वास करती जाऊँ और हर उस बनते विश्वास को फिर तोड़ती भी जाऊँ. तुम को टूटने का दर्द पता है न? उस दिन जब तोड़ा था तुम्हें, तो तुम्हे शायद कहीं-से भी तो थोडा-सा दर्द हुआ होगा न. फिर भी नहीं समझते कि मुझे कितना दर्द होता है? कहते है जो होना होता है वो पहले से लिखा हुआ होता है, तो ये बताओ जब तुमने सब कुछ मेरे लिए निर्धारित करके रखा है, तो जो मैं कर रही हूँ वो मैं नहीं तुम करवा रहे होगे न. तो दोषी कौन? और सजा किसको मिले? मैंने तो नहीं लिखा था अपना किस्मत, तो मैं क्यूँ रोऊँ? तुमको लिखना आसान लगता होगा, इसलिए कुछ भी लिख देते होगे किसी के हिस्से में. कभी अपनी किस्मत में भी कुछ भी लिख लेते, तो मुझे भी तसल्ली होती.